शिवपुरी (मध्यप्रदेश)
सहरिया समाज में आस्था और धर्म चेतना की लहर अब क्रांति का रूप ले चुकी है। सनातन संस्कृति और अपनी जड़ों की ओर लौटने की भावना को जीवंत करते हुए सहरिया क्रांति परिवार ने रविवार को अब तक की सबसे भव्य 30 किलोमीटर लंबी चुनरी यात्रा का आयोजन किया। यह ऐतिहासिक यात्रा ग्राम डबिया से आरंभ होकर माँ बलारी माता के पावन दरबार तक पहुँची, जिसमें हजारों श्रद्धालु नंगे पाँव भक्ति की अग्निपरीक्षा देते हुए शामिल हुए।
सुबह 9 बजे डबिया से जैसे ही यात्रा प्रारंभ हुई, पूरा वातावरण “जय माता दी, माता रानी की जय, सहरिया क्रांति जिंदाबाद” के नारों से गूंज उठा। बच्चे, युवा, महिलाएँ और बुजुर्ग – सभी धर्मध्वजा लेकर माता के भजनों में लीन होकर कदम-दर-कदम आगे बढ़ते रहे। मार्ग में पड़ने वाले हर गाँव में ग्रामीणों ने श्रद्धापूर्वक फल, छाछ और प्रसाद से यात्रियों का स्वागत किया। स्त्रियाँ थालियों में दीप और रोली लेकर द्वार-द्वार से आशीर्वाद देती नजर आईं।
यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि सहरिया समाज की एकता, संस्कृति और आत्मगौरव का उत्सव बन गई।
यात्रा का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया, जब ऊधम आदिवासी ने डबिया मंदिर से पेट पर नेज़ा (धार्मिक व्रत) बाँधकर 30 किलोमीटर की यात्रा पैदल पूरी करने का संकल्प लिया। उनकी इस अटूट श्रद्धा ने सभी श्रद्धालुओं की आँखें नम कर दीं और हर किसी ने उनके समर्पण को नमन किया।

पूरी यात्रा के दौरान सहरिया क्रांति परिवार और सरपंच संघ के सेवादार लगातार फल, पानी और छाछ वितरित करते हुए सेवा भाव की मिसाल बने रहे। इस आयोजन में संजय बेचैन, विजय भाई आदिवासी, औतार आदिवासी, अनिल आदिवासी, मक्खन आदिवासी, कल्याण आदिवासी, अजय आदिवासी, भदौरिया आदिवासी, राजकुमार आदिवासी, प्रदीप आदिवासी, सावदेश आदिवासी, केशव आदिवासी, राज आदिवासी और हजरत आदिवासी सहित सैकड़ों साथियों ने व्यवस्था को शानदार ढंग से संभाला।
इस धार्मिक आयोजन की शृंखला में ग्राम डबिया पीपलवाले श्री हनुमानजी एवं काली माता मंदिर परिसर में त्रिदिवसीय महायज्ञ एवं देवी अनुष्ठान का भी आयोजन किया गया —
🔸 3 नवंबर: कलश यात्रा और हवन
🔸 4 नवंबर: माता पूजन एवं पूर्णाहुति
🔸 5 नवंबर: माँ बलारी के दरबार में चुनरी यात्रा का भव्य समापन
वैदिक विधान और अनुष्ठान का संचालन पंडित महेंद्र कोठारी (गढ़ी बरोद वाले) द्वारा किया गया। पूरे मार्ग में “माता के जयकारे” गूंजते रहे, जो जंगलों, घाटियों और पहाड़ों से टकराकर श्रद्धा की प्रतिध्वनि बनकर लौटते रहे।

अंततः यह यात्रा इस बात का प्रतीक बनी कि जब समाज अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ता है, तो वह केवल भक्ति नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व का उत्सव मनाता है।
आज माँ बलारी के चरणों में सिर्फ चुनरी नहीं चढ़ी — बल्कि पूरे सहरिया समाज की श्रद्धा, विश्वास और आत्मगौरव ने अभिषेक पाया।




